Thursday, 12 October 2017

महापुरुषों के अनमोल विचार

महापुरुषों के अनमोल विचार 
1. यदि मार्ग काँटों भरा हो, और आप नंगे पांव हो तो रास्ता बदल लेना चाहिए – चाणक्य
2. वाणी के बजाय कार्य से दिए गए उदाहरण कहीं ज्यादा प्रभावी होते हैं -अज्ञात
3. मनुष्य का पतन कार्य की अधिकता से नहीं वरन कार्य की अनियमितता से होता है- अज्ञात
4. कायर आदमी अपनी मौत से पहले न जाने कितनी बार मरता है- अज्ञात
5. जो सभी का मित्र होता है वो किसी का मित्र नहीं होता – ओशो
6. क्रोध में मनुष्य अपने मन की बात कहने के बजाय दूसरों के ह्रदय को ज्यादा दुखाता है। -प्रेमचंद

7. सारा हिन्दुस्तान गुलामी में घिरा हुआ नहीं है। जिन्होंने पश्चिमी शिक्षा पाई है और जो उसके पाश में फँस गए हैं, वे ही गुलामी में घिरे हुए हैं – महात्मा गाँधी
8. मानव जीवन धूल की तरह होता है, हम इसे रो-धोकर  इसे कीचड़ बना देते हैं -बकुल वैद्य
9. सौंदर्य और विलास के आवरण में महत्त्वाकांक्षा उसी प्रकार पोषित होती है जैसे म्यान में तलवार – रामकुमार वर्मा
10. जिस प्रकार बिना जल के धान नहीं उगता उसी प्रकार बिना विनय के प्राप्त की गई विद्या फलदायी नहीं होती – भगवान महावी
11. अकर्मण्यता के जीवन से यशस्वी जीवन और यशस्वी मृत्यु श्रेष्ठ होती है -चंद्रशेखर वेंकट रमण
12. सत्य से कीर्ति प्राप्त की जाती है और सहयोग से मित्र बनाए जाते हैं -कौटिल्य अर्थशास्त्र
13. जिस प्रकार जल कमल के पत्ते पर नहीं ठहरता है, उसी प्रकार मुक्त आत्मा के कर्म उससे नहीं चिपकते हैं -छांदोग्य उपनिषद
14. कामनाएँ समुद्र की भाँति अतृप्त हैं। पूर्ति का प्रयास करने पर उनका कोलाहल और बढ़ता है -स्वामी विवेकानंद
15. जैसे सूर्य आकाश में छुप कर नहीं विचर सकता उसी प्रकार महापुरुष भी संसार में गुप्त नहीं रह सकते -व्यास
16. पुरुषार्थ से दरिद्रता का नाश होता है, जप से पाप दूर होता है, मौन से कलह की उत्पत्ति नहीं होती और सजगता से भय नहीं होता – चाणक्य
17. शासन के समर्थक को जनता पसंद नहीं करती और जनता के पक्षपाती को शासन। इन दोनो का प्रिय कार्यकर्ता दुर्लभ है- पंचतंत्र
18. ख्याति नदी की भाँति अपने उद्गम स्थल पर क्षीण ही रहती है किंदु दूर जाकर विस्तृत हो जाती है -भवभूति
19. कुमंत्रणा से राजा का, कुसंगति से साधु का, अत्यधिक दुलार से पुत्र का और अविद्या से ब्राह्मण का नाश होता है – विदुर
20. सारा जगत स्वतंत्रता के लिए लालायित रहता है फिर भी प्रत्येक जीव अपने बंधनो को प्यार करता है- श्री अरविंद
21. बुद्धि के सिवाय विचार प्रचार का कोई दूसरा शस्त्र नहीं है, क्योंकि ज्ञान ही अन्याय को मिटा सकता है- शंकराचार्य
22. खुद के लिये जीनेवाले की ओर कोई ध्यान नहीं देता पर जब आप दूसरों के लिये जीना सीख लेते हैं तो वे आपके लिये जीते हैं – श्री परमहंस योगानंद
23. बच्चों को पालना, उन्हें अच्छे व्यवहार की शिक्षा देना भी सेवाकार्य है, क्योंकि यह उनका जीवन सुखी बनाता है -स्वामी राम सुखदास
24. खुशियों को दामन में भरने पर वह थोड़ी सी लगती हैं, लेकिन यदि उन्हें बांटा जाये तो वे और ज्यादा बड़ी नजर आती हैं -अज्ञात
25. उठो जागो और लक्ष्य तक मत रुको -स्वामी विवेकानंद
26. सत्य से बड़ा तो इश्वर भी नहीं – महात्मा गाँधी
27. दो की दोस्ती में एक का धर्य जरुरी है -अज्ञात
28. किसी को माफ़ करना कमजोरी नहीं वरन सामर्थ्यवान ही ऐसा कर सकता है -महात्मा गाँधी
29. मेहनत करने से दरिद्रता नहीं रहती, धर्म करने से पाप नहीं रहता, मौन रहने से कलह नहीं होता – चाणक्य
30. क्रोध ऐसी आँधी है जो विवेक को नष्ट कर देती है – अज्ञात
31. मुठ्ठी भर संकल्पवान लोग जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ़ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं – महात्मा गांधी
32. हज़ार योद्धाओं पर विजय पाना आसान है, लेकिन जो अपने ऊपर विजय पाता है वही सच्चा विजयी है – गौतम बुद्ध
33. मन एक भीरु शत्रु है जो सदैव पीठ के पीछे से वार करता है – प्रेमचंद
34. अपने को संकट में डाल कर कार्य संपन्न करने वालों की विजय होती है, कायरों की नहीं – जवाहरलाल नेहरू
35. विश्वास वह पक्षी है जो प्रभात के पूर्व अंधकार में ही प्रकाश का अनुभव करता है और गाने लगता है – रवींद्रनाथ ठाकुर
36. ऐसे देश को छोड़ देना चाहिए जहाँ धन तो है लेकिन सम्मान नहीं -विनोबा भावे
37. अच्छे शब्दों के प्रयोग से बुरे लोगों का भी दिल जीता जा सकता है- भगवान बुद्ध
38. मनुष्य का सबसे बड़ा यदि कोई शत्रु है तो वह है उसका अज्ञान – चाणक्य

इच्छाएं ही सब दुखों का मूल कारण है – भगवान बुद्ध
39. ब्रह्माज्ञानी को स्वर्ग तृण है, शूर को जीवन तृण है, जिसने इंद्रियों को वश में किया उसको स्त्री तृण-तुल्य जान पड़ती है, निस्पृह को जगत तृण है -चाणक्य
40. सबसे उत्तम तीर्थ अपना मन है जो विशेष रूप से शुद्ध किया हुआ हो -स्वामी शंकराचार्य
41. कर्म, ज्ञान और भक्ति का संगम ही जीवन का तीर्थ राज है -दीनानाथ दिनेश
42. तपस्या धर्म का पहला और आखिरी कदम है -महात्मा गांधी
43. अपनी पीड़ा सह लेना और दूसरे जीवों को पीड़ा न पहुंचाना, यही तपस्या का स्वरूप है -संत तिरुवल्लुवर
44. सत्याग्रह बल से नहीं ,हिंशा के त्याग से होता है -महात्मा गाँधी
45. लोग चाहे मुट्ठी भर हों,  लेकिन संकल्पवान हों, अपने लक्ष्य में दृढ आस्था हो, वे इतिहास को भी बदल सकते हैं -महात्मा गाँधी

46. हर आदमी कहता है की मैं अच्छा हूँ, लेकिन लोग क्या मानते हैं यह महत्वपूर्ण है – अज्ञात

 

मृत्युभोज- जश्न ए मौत

*मृत्युभोज भी कोई भोज होता है?*

    एक किसान जिंदगी भर खेतों में काम करता है।खेती सबको पता है कि अब नफा कम नुकसान ज्यादा करती है लेकिन विकल्प के अभाव में हाड़तोड़ मेहनत करके गृहस्थी का बोझ उठाने का अनवरत प्रयास चलता रहता है।लेकिन जब इसी सूखे बदन व चेहरे पर झुर्रियां लिए किसान के ऊपर ब्राह्मणवाद टूट पड़े तो क्या हाल होता होगा इसके परिवार का!मैं खुद कई परिवारों की दुर्गति का मूकदर्शक गवाह रहा हूँ।कब तक इस तरह बर्बाद होते परिवारों को चुपचाप देखता रहूँ?कुछ तो लूट की सीमा हो!कुछ तो मानवता की मर्यादाएं हो!कुछ तो पंचों में इंसानियत का अंश जिंदा मिले!बूढ़े किसान की मौत पर सब इस तरह खाने को टूट पड़ते है जैसे उनके जीवन का अंतिम खाना यही हो!फिर कभी मिलेगा ही नहीं!इंसान की गिरावट को देखकर गिद्ध विलुप्त हो गए हमारे क्षेत्र से!एक दूसरे की झूठन चाटने की इंसानी कला को देखकर कुत्ते भी आने बंद हो गए लेकिन इंसान है कि गिरना बंद करता ही नहीं!
              कोई इंसान मर जाये,उसके बच्चे अनाथ से हो जाते है,उसकी विधवा गला फाड़-फाड़कर रो रही होती है।इन कर्कश-क्रंदन रोने की चीखों के बीच बैठकर इंसान मिठाईयां खा कैसे लेता है?कुछ तो इंसान कहने के लिए संवेदनाओं के टुकड़े खुद के अंदर बचा लो!सिर मुंडाएं,आंखों में आंसुओ का सैलाब लिए झूठी थालियों को लिए घूम रहे बच्चों पर तरस खा लो!क्यों झूठी शान के लिए इन परिवारों को बर्बाद किये जा रहे हो?जो समाज के पंच लोग है ,जो इस मृत्युभोज रूप नरकासुर प्रथा का समर्थन करते है असल मे ये लोग इंसानी जामे में भूखे भेड़िए है।सभ्य समाज मे ऐसे लोगों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।किसी जानवर की मौत पर उस प्रजाति के बाकी जानवर मुंह लटकाकर भूखे बैठे रहते है लेकिन ये लोग अर्थी आंगन में पड़ी रहती है और बारह दिनों के भोजन का हिसाब लगाने बैठ जाते है।कुछ तो शर्म करो!इंसान होकर इंसानियत भूल गए तो जानवरों से ही कुछ सीख लो!
                  एक मृत्युभोज में लगभग 10 युवा अफीमची पैदा कर दिए जाते है।ये नशेड़ी ही आगे मृत्युभोज के वाहक-समर्थक बनकर घूमते है।एक मौत पर लगभग 15दिनों तक इनके लिए नशे का इंतजाम हो जाता है।न कमाने की नीयत,न अपने बच्चों के होते है,न अपने परिवार के होते है और यह नशेड़ियों का झुंड दूसरों के परिवारों को बर्बाद करते जाता है और  झुंड में नित नए सदस्य भर्ती करते जाते है।डोडा-पोस्त के नशे की लत ऐसी होती है कि पैसे के इंतजाम व कमाई का जरिया इनके लिए कोई मायने नहीं रखता।नशेड़ी घर मे बैठे बूढ़े बाप के मरने का भी इंतजार करता है ताकि 15दिनों तक नशे का इंतजाम हो जाये चाहे उसके लिए बाप द्वारा सँजोई जमीन को ही क्यों न बेचना पड़े!गांव के गांव खाने व नशे के लिए उमड़ पड़ते है।ओढावनी-पहरावणी के नाम पर कपड़ों का इंतजार करते-रहते है।सारे रिश्तेदार बनियों की दुकानों पर लुटते फिरते है।खुद नशेड़ी लोग सिर मुंडाकर इस उम्मीद में बैठे रहते है कि ससुराल वाले ओढावनी के नाम पर मदद कर जाए!एक तरह से यह लालची व भूखे-नंगे लोगों का जमघट होता है।एक मौत पर मानवता का नंगा नाच होता है जिसे मृत्युभोज के नाम पर पुण्य का काम बताकर आयोजन किया जाता है।यह इंसानी पाप का चरम है जिसे पारलौकिक कल्पनाओं से रचित जलसा बताकर किया जाता है।
                 मानवता के इस ख़ौफ़नाक मंजर से जितना जल्दी हो मुक्ति ले लेनी चाहिए।सिर्फ मृत व्यक्ति के बेटे-बेटियों व बहुओं के अलावे किसी के लिए कोई कपड़ा लाने की रश्म अदायगी न की जाए।सिर्फ मृतव्यक्ति के परिवार वालों व उनके खास रिश्तेदारों के अलावे कोई इस आयोजन का भागीदार न बने।नशे के उपयोग पर पूर्ण पाबंदी हो।कोई रिश्तेदार भी मृत व्यक्ति के घर खाना न खाए।जो रिश्तेदार भौतिक रूप से दूर से आया हो उसके लिए खाने का इंतजाम पडौसी भाई करे।बारह दिनों के नाम पर जो इंसानियत को खोखली करने की रश्म है उसे घटाकर 3-5दिन के बीच सीमित किया जाए।जो खास रिश्तेदार है उनको एक नियत दिन एक साथ आने को कह दें।सिर मुंडाएं बच्चों की गांव से लेकर हरिद्वार तक की बस-रेलों में चल रही अस्थि-विसर्जन यात्राओं पर रोक लगाई जाएं।ये पाखंड की उड़ाने भरने से हर हाल में बचा जाना चाहिए।
                    जो पैसा बुढ़ापे में इस डर से इलाज पर खर्च नहीं किया जाता कि अगर मर गया तो मृत्युभोज का इंतजाम कैसे होगा!वो पैसा इलाज पर खर्च होगा।बच्चों की पढ़ाई पर खर्च होगा।काम-धंधों में निवेश होगा तो घरों में खुशहाली आएगी।परिवारों की  बर्बादी का आलम खुशहाली में तब्दील हो जाएगा।अब इस तरह की तस्वीरें आगे नजर नहीं आनी चाहिए।
ऐसे सामाजिक कलंक के धब्बों की धुलाई कर लीजिए।ये दाग बहुत बुरे है।