समाज से आदर्शों का विलुप्त होना, सदाचारों का खण्डित होना या नष्ट हो जाना व्यक्तिगत जीवन मूल्यों का भी विनाश है। और नैतिकताओं पर व्यक्तिगत अनास्था, सामाजिक चरित्र का पतन है.
अपने सीरवी समाज के लोगों ने पिछले कई सालों में आर्थिक रूप से काफी तरक्की की है जो सर्वविदित है। पर कुछ बातें नकारात्मक हैं जो हमें सामाजिक और बौद्धिक रूप से प्रगति करने से रोक रही है। अगर हम इस पर विजय पा लें तो हमारा सीरवी समाज सचमुच बहुत आगे जाएगा।
👉दिखावे एवं प्रदर्शन की इस सभ्यता ने मानव-मन की शांति का हरण कर लिया है । असंतोष इसकी मूल प्रवृत्ति है । प्रतियोगी और तुलनात्मक जीवन इसकी प्रमुख प्रेरणा है । अपने पडोसी पर ‘नहले’ पर ‘दहला’ दिखाई देने की होड़ और दौड़ में बाजी मार लेने को यहां ‘प्रगति’ माना जाता है । लौकिक सम्बन्धों-सम्बोधनों को यहां क्लब, शराब, जुआ, नग्नता और स्वैराचार को यूरोपीय-स्वीकृति मानकर आधुनिक होने का प्रदर्शन किया जाता है ।
👉मर्यादाहीनता को समरसता कहा जाता है । विकृत आनन्दातिरेक को यहां सामाजिक अभिसरण माना जाता है । पश्चिमी आधुनिकता का यह दानवी उपभोक्तापन सीरवी समाज के संस्कार और संस्कृति को निगल रहा है ।आज सीरवी समाज में सभ्य होने का अर्थ है असभ्यता, सुसंस्कृत होना है दुकान गाड़ी और फ्लैट।
😳जब-जब सीरवी समाज अपनी जीवनधारा में और संस्कृति की भावभूमि पर उतरने लगता है । सभ्यता का यह संकट उसके सामने ताल ठीक कर खड़ा हो जाता है कि संयम, संतोष, कुल परम्परा, पारिवारिकता, सदाचार, सामाजिकता, परम्पराबोध और लोकलाज बीते दिनों की बातें हैं ।🙏
एक वक्त था जब लोग शादी से पहले की मुलाकातों में और शादी-शुदा ज़िंदगी में कुछ स्तरों का पालन करते थे, पिता बच्चों की परवरिश करना अपनी ज़िम्मेदारी समझते थे और बुरे काम देखकर लोगों का क्रोध भड़क उठता था, गंदे काम करने पर वे शर्म महसूस करते थे।
चारों ओर के वातावरण का प्रभाव पड़े बिना नहीं रहना ,जिस समाज में व्यक्ति रहता है और जिसमें उसे जीना है उससे निरपेक्ष हो कर नहीं रह सकता.स्वयं अपनी मानसिकता सुधारते हुए समाज में तदनुकूल परिस्थितियां बनाना और उसे सचेत करना भी आवश्यक है ! इसी संदर्भ मे भगवान कृष्ण ने गीता के अध्याय 6 के 5 वे श्लोक मे कहा है
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
अर्थात अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है॥5॥
👉माफ़ कीजियेगा, हममें से ज्यादातर लोग Inferiority Complex से ग्रसित हैं। आप याद कीजिये, कहीं भी अपने पाँच लोग इकट्ठे होंगे तो उसमे से दो लोग जरूर ऐसे मिलेंगे जो आपको ये बताते रहते हैं कि मैं ये हूँ मैं वो हूँ, मेरे पास इतनी property है, मैंने इधर तीर चलाया, उधर तलवार चलाया। गाँव में बड़ा सा घर बना दिए हैं, शहर में भी फ्लैट है, दो चार गाड़ी भी है, वगैरह वगैरह। ये और कुछ नहीं हीनभावना है। दरअसल हममें से ज्यादातर लोग गरीबी से निकलकर आये हैं, तो वो यही साबित करने में परेशान रहते हैं की अब हम गरीब नहीं रहे। खुद के बारे में बढ़ा चढ़ाकर बताते रहते हैं। अच्छे अच्छे लोगों में यह प्रवृति देखी है मैंने। अरे भाई आप जो हैं उसे बताने की क्या जरूरत है। हीरा कब कहे लाख टका मोरे मोल। कृपया इस मानसिकता से ऊपर उठिए आपको कुछ भी साबित करने की जरूरत नहीं है।
और पुराणों में कहा भी गया है
अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः ।
उत्तमाः मानमिच्छन्ति मानो हि महताम् धनम्॥
भावार्थ :
निम्न कोटि के लोग केवल धन की इच्छा रखते हैं, उन्हें सम्मान से कोई मतलब नहीं होता है । जबकि एक मध्यम कोटि का व्यक्ति धन और मान दोनों की इच्छा रखता है । और उत्तम कोटि के लोगों के लिए सम्मान हीं सर्वोपरी होता है सम्मान धन से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है ।
👉 यदि सभ्य बनना, सभ्य होना और सभ्य कहलाना है तो निर्बध बनना-होना होगा ।’ सीरवी समाज के कुछ लोगों ने समाज की परंपराओं को इस कदर अपने कब्जे में कर रखा है कि नैतिकता- अनैतिकता, पाप-पुण्य, परिवार-पडोसी और समाज-सम्बन्धो का समीकरण एकदम उलटता जा रहा है ।
😇👉पहले हम सीरवी समाज के लोग कोई गलत काम करने से डरते- घबराते थे । कोई गलत काम कराता या गलत काम करने के लिए कहता था तो हम अपने बाल-बच्चों का वास्ता देते थे । कहते थे ”हमारे बाल-बच्चे हैं, यह गलत काम करके हम उनका भविष्य नही बिगाड़ेंगे ?”
😜👉हम आज भी कहते यही हैं लेकिन संदर्भ बदला हुआ है । कोई भी काम अब गलत नहीं रह गया है । यदि गलत काम करने से कोई हमें रोकता-टोकता है तो हम कहते हैं कि ‘भाई हमारे भी बाल-बच्चे हैं । हमें भी उनका पालन-पोषण करना है, अगर यह काम नहीं करेंगे तो उन्हें खिलाएं-पिलाएंगे कहाँ से ?’
पहले बाल-बच्चों के नाम पर या उनके कारण जो गलत काम और पाप करने से घबराते, डरते थे, आज उन्हीं बाल-बच्चों के नाम पर वही गलत काम धडल्ले से करते हमें कोई लाज-संकोच या घबराहट नहीं होती ।
😳👉कुछ लोग अपने सीरवी समाज में Superiority complex के भी शिकार हैं। ज़रा सी सफलता मिली नहीं की खुद को भगवान समझ बैठे। समाज और परिवार के लोग उन्हें अछूत लगने लगते हैं। ऐसे लोग सफलता पचा नहीं पाते हैं और सारा जीवन समाज से दूर रहते हैं। जब बुढ़ापा आता है या रिटायर हो जाते हैं और इनके अपने बच्चे भी जब इन्हें नहीं पूछते हैं तब इन्हें समाज की याद आती है। पर जो सारा जीवन सबों को दुत्कारता आया हो, उसे समाज कैसे स्वीकारे। परिणाम यह होता है की एकाकी जीवन जीने को मजबूर रहते हैं। अभी भी समय है अपने लोगों से जुड़िये, अगर आप सक्षम हैं तो लोगों की मदद कीजिये, उनकी दुआएँ आपको लगेंगी।
"सफल रिश्तों के, यही उसूल हैं,
बातें भूलिए, जो फिजूल हैं!"
👉हमारे सीरवी समाज में महिलाओं
👭 के साथ जिस तरह का व्यवहार (बार-बार तलाक, अदला बदली कांसेप्ट) होता है, मुझे उस पर आपत्ति है और मैं इस बारे में ठोस राय रखता हूँ। लेकिन मैं अपनी राय प्रकट कर देता हूँ, तो उल्टा मुझे समझाते हैं, ' चुप रहो, । इस बारे में राय देने वाले तुम कौन होते हो।"
दरअसल उनके साथ भेदभाव करने का रवैया, समाज में कूट-कूटकर भरा है।
अभी तो अपने समाज में अधिकतर महिलाओं 👧 को यह आभास भी नहीं है की वे शोषण का शिकार हो रही हैं और स्वयं एक अन्य महिला का शोषण करने में समाज को सहयोग कर रही है.
आज यह पूरे सीरवी समाज का दायित्व है कि वह नारी को बराबरी का स्थान दें। अब इसको कोई नारी मुक्ति का नाम दे या नारी शक्तिकरण का, उससे कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। नारी और पुरुष एक दूसरे के शत्रु नहीं हैं बल्कि पूरक हैं। कहा भी गया है शिव शक्ति के बिना शव के समान हैं। राधा के बिना कृष्ण आधा हैं। नारियों की समस्या केवल उनकी समस्या नहीं है। यह पूरे समाज की समस्या है। या यूं कहिए सामाजिक समस्या का एक अंग है। साफ है कि नारी की स्थिति में बदलाव लाने के लिए पूरे सामाजिक ढांचे एवं सोच में बदलाव लाना जरूरी है।
महिलाएं समाज से अपने लिए देवी का संबोधन नहीं मांगती हैं। स्त्रियों को देवी समझा जाए या नहीं लेकिन कम से कम उन्हें मानव की श्रेणी से नीचे न गिराया जाए।
👉आप अध्ययन करके देखें तो पाएंगे कि अपनी सीरवी समाज में अपनी क्षमता से अधिक पैसे शादी पर खर्च करने की प्रवृत्ति है। इसके कई कारण होते हैं। अपने दैनंदिन जीवन में सीमित संसाधनों से अपना काम चलाने वाले व्यक्ति के लिए शादी सिर्फ एक सामाजिक समारोह न होकर यह दिखाने का अवसर होता है कि उसने पिछले 25 सालों में क्या किया? आर्थिक सीढ़ियों पर कितनी पायदानें इस बीच वह चढ़ चुका है यह दिखाने के लिए शादी के अलावा यदि उसके पास कोई दूसरा मौका होता है तो वह होता है आलीशान घर बनवाने का।
सीरवी समाज में शादियों में होने वाले खर्च के बारे में मेरा विचार है कि शादियों का खर्च हैसियत के अंदर रहे। शादियों के खर्च को प्रतियोगिता से अलग रखना चाहिए। आप समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में पढ़ते होंगे कि हर उस समाज में जहां आज भी परंपराएं मजबूत हैं शादियों के खर्च को सीमाओं में बांधने की जद्दोजहद जारी है। हाल ही में मैंने पढ़ा कि किसी उत्तरी भारत के राज्य में गुर्जरों की पंचायत ने शादियों के समारोह पर कुछ प्रतिबंध लगाए हैं। समस्या यह है कि अपने समाज में पंचायतें मजबूत नहीं हैं। शहरी समाज में तो वे हैं ही नहीं। ऐसे में सामाजिक संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उदाहरण के लिए राजस्थान से निकल कर भारत के विभिन्न हिस्सों में बसे सीरवी समाज के लोगों के कई मजबूत सामाजिक संगठन हैं। ये संगठन पंचायत नहीं हैं, लेकिन चाहें तो पंचायतों जैसा महत्व हासिल कर सकते हैं। ऐसे संगठन अपने समाज में शादी विवाह पर होने वाले खर्च की सीमाएं बांध सकते हैं। हालांकि यह कहना जितना आसान है करना उतना ही मुश्किल है।
निखरती है मुसीबतों से ही!
शख्सियत यारों !!
जो चट्टान से ही ना उलझे!
वो झरना किस काम का!!
👉यह लेख लिखने की प्रक्रिया के दौरान ही कुछ मित्रों से इस विषय पर बहस हुई। एक मित्र का कहना था कि आप उपभोक्तावाद का विरोध कर रहे हैं, और यह विरोध आज के युग में ज्यादा आगे तक चलने वाला नहीं है। आज लोग महंगी कार लेकर अपनी हैसियत में आए परिवर्तन के बारे में लोगों को सूचना देना चाहते हैं। उन्हें आप किस तरह रोकेंगे। इस पर मेरा कहना यह है कि जब हम शादियों में आडंबर और धन के भद्दे प्रदर्शन पर रोक लगाने की वकालत करते हैं तो हमारा उद्देश्य वहीं तक सीमित होता है। इसे बाकी उपभोक्तावाद के साथ गड्डमड्ड नहीं करना चाहते। क्योंकि शादी एक सामाजिक समारोह है, जो हर परिवार को एक न एक दिन आयोजित करना है। जब कोई धनाढ्य व्यक्ति शादी में होने वाले खर्च की सीमा को ऊंचा उठा देता है तो उसके वर्ग के समकक्ष व्यक्तियों पर एक तरह का दबाव पैदा हो जाता है कि उन्हें भी अपनी सामाजिक स्थिति को बचाए रखने के लिए इसी तरह का खर्च करना होगा। इस तरह शादियों में खर्च अपव्यय और भौंडे दिखावे की सीमाएं छूने लग जाता है। लेकिन जहां तक महंगी कार, या महलनुमा घर की बात है- इस तरह का उपभोक्तावाद भले ईर्ष्या और आतंक पैदा करे लेकिन इससे समाज का आम व्यक्ति यह दबाव महसूस नहीं करता कि उसे भी इस तरह का खर्च करना होगा। एक सामाजिक एक्टिविस्ट ने ठीक ही कहा िक "जनम-वरण और मरण' के अवसर पर होने वाले अनुष्ठान सामाजिक निगरानी के तहत होने चाहिए। ये अवसर व्यक्तिगत होते हुए भी नितांत व्यक्तिगत नहीं हैं। इन तीनों अवसरों के लिए बनाए गए विधान सामाजिक पंचायतें और संगठन लागू भी कर सकते हैं, क्योंकि कोई कितना ही धनी क्यों न हो वह इस बात को स्वीकार करता है कि इन अवसरों के बारे में समाज को बोलने का अधिकार है।
*यूँ ही नहीं होती हैं जिंदगी में तब्दीलियाँ ....,*
*मौम को भी रोशन होने के लिये पिघलना पड़ता है*
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पत्नि 👧 का सम्मान केवल वही विवाहिता स्त्री पा सकती हा जो अपने घर को सम्भाल सके, अपने बच्चों में आत्म सम्मान तथा अपनी संस्कृति की सही पहचान करवा सके। इन बातों का उस की पढाई और कमाई से कोई सम्बन्ध नहीं।
कमाने वाली विवाहित महिला 👧 आर्थिक तौर पर स्वतन्त्र तो हो सकती है लेकिन यह जरूरी नहीं कि उसे पत्नी का दर्जा भी दिया जाये। वह केवल कमाई में ऐक पार्टनर होती है और फायदे नुकसान के अनुसार पार्टनर बदले भी जा सकते हैं। पत्नि का दर्जा पाना बहुत महत्वशाली है लेकिन नौकरी कर के कमाना कोई बहुत बडी बात नहीं होती।
भावुक हो कर पढने की जरूरत नहीं लेकिन वैवाहिक जीवन की सच्चाई यही है। अफसोस की बात है कि आज अधिकांश भारतीय महिलायें इस बात को भूल कर विदेशी नकल कर के अपनी संस्कृति और घरों को को बरबादकर रही हैं।
👉पैसा ही सब कुछ नहीं है जो लोग किसी की बाहरी हालत से उसकी कीमत लगाते हैं वह तुरंत अपना इलाज करवाएं।
मानव मूल की असली कीमत उसकी नैतिकता, व्यवहार, मेलजोल का तरीका, सुल्ह-रहमी, सहानुभूति और भाईचारा है। ना कि उसकी मोजुदा शक्ल और सूरत … !!!
सूर्यास्त के समय एक बार सूर्य ने सबसे पूछा, मेरी अनुपस्थिति मे मेरी जगह कौन कार्य करेगा?
समस्त विश्व मे सन्नाटा छा गया। किसी के पास कोई उत्तर नहीं था। तभी कोने से एक आवाज आई।
दीपक ने कहा “मै हूं ना”
मै अपना पूरा प्रयास करुंगा ।
आपकी सोच में ताकत और चमक होनी चाहिए। छोटा -बड़ा होने से फर्क नहीं पड़ता,सोच बड़ी होनी चाहिए। मन के भीतर एक दीप जलाएं और सदा मुस्कुराते रहें।
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नज़र अंदाज़ करने की आदत है मेरी लेकिन
कुछ चर्चाओं मे जागरूकता लाना फितरत है मेरी....
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