Saturday, 31 March 2018

वचन सामंजस्य का.......

समाज से आदर्शों का विलुप्त होना, सदाचारों का खण्डित होना या नष्ट हो जाना व्यक्तिगत जीवन मूल्यों का भी विनाश है। और नैतिकताओं पर व्यक्तिगत अनास्था, सामाजिक चरित्र का पतन है.

अपने सीरवी समाज के लोगों ने पिछले कई सालों में आर्थिक रूप से काफी तरक्की की है जो सर्वविदित है। पर कुछ बातें नकारात्मक हैं जो हमें सामाजिक और बौद्धिक रूप से प्रगति करने से रोक रही है। अगर हम इस पर विजय पा लें तो हमारा सीरवी समाज सचमुच बहुत आगे जाएगा।

👉दिखावे एवं प्रदर्शन की इस सभ्यता ने मानव-मन की शांति का हरण कर लिया है । असंतोष इसकी मूल प्रवृत्ति है । प्रतियोगी और तुलनात्मक जीवन इसकी प्रमुख प्रेरणा है । अपने पडोसी पर ‘नहले’ पर ‘दहला’ दिखाई देने की होड़ और दौड़ में बाजी मार लेने को यहां ‘प्रगति’ माना जाता है । लौकिक सम्बन्धों-सम्बोधनों को यहां क्लब, शराब, जुआ, नग्नता और स्वैराचार को यूरोपीय-स्वीकृति मानकर आधुनिक होने का प्रदर्शन किया जाता है ।

👉मर्यादाहीनता को समरसता कहा जाता है । विकृत आनन्दातिरेक को यहां सामाजिक अभिसरण माना जाता है । पश्चिमी आधुनिकता का यह दानवी उपभोक्तापन सीरवी समाज के संस्कार और संस्कृति को निगल रहा है ।आज सीरवी समाज में सभ्य होने का अर्थ है असभ्यता, सुसंस्कृत होना है दुकान गाड़ी और फ्लैट।

😳जब-जब सीरवी समाज अपनी जीवनधारा में और संस्कृति की भावभूमि पर उतरने लगता है । सभ्यता का यह संकट उसके सामने ताल ठीक कर खड़ा हो जाता है कि संयम, संतोष, कुल परम्परा, पारिवारिकता, सदाचार, सामाजिकता, परम्पराबोध और लोकलाज बीते दिनों की बातें हैं ।🙏

एक वक्‍त था जब लोग शादी से पहले की मुलाकातों में और शादी-शुदा ज़िंदगी में कुछ स्तरों का पालन करते थे, पिता बच्चों की परवरिश करना अपनी ज़िम्मेदारी समझते थे और बुरे काम देखकर लोगों का क्रोध भड़क उठता था, गंदे काम करने पर वे शर्म महसूस करते थे।

चारों ओर के वातावरण का प्रभाव पड़े बिना नहीं रहना ,जिस समाज में व्यक्ति रहता है और जिसमें उसे जीना है उससे निरपेक्ष हो कर नहीं रह सकता.स्वयं अपनी मानसिकता सुधारते हुए समाज में तदनुकूल परिस्थितियां बनाना और उसे सचेत करना भी आवश्यक है ! इसी संदर्भ मे भगवान कृष्ण ने गीता के अध्याय 6 के 5 वे श्लोक मे कहा है    

उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌ ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

  अर्थात अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है॥5॥

👉माफ़ कीजियेगा, हममें से ज्यादातर लोग Inferiority Complex से ग्रसित हैं। आप याद कीजिये, कहीं भी अपने पाँच लोग इकट्ठे होंगे तो उसमे से दो लोग जरूर ऐसे मिलेंगे जो आपको ये बताते रहते हैं कि मैं ये हूँ मैं वो हूँ, मेरे पास इतनी property है, मैंने इधर तीर चलाया, उधर तलवार चलाया। गाँव में बड़ा सा घर बना दिए हैं, शहर में भी फ्लैट है, दो चार गाड़ी भी है, वगैरह वगैरह। ये और कुछ नहीं हीनभावना है। दरअसल हममें से ज्यादातर लोग गरीबी से निकलकर आये हैं, तो वो यही साबित करने में परेशान रहते हैं की अब हम गरीब नहीं रहे। खुद के बारे में बढ़ा चढ़ाकर बताते रहते हैं। अच्छे अच्छे लोगों में यह प्रवृति देखी है मैंने। अरे भाई आप जो हैं उसे बताने की क्या जरूरत है। हीरा कब कहे लाख टका मोरे मोल। कृपया इस मानसिकता से ऊपर उठिए आपको कुछ भी साबित करने की जरूरत नहीं है।
और पुराणों में कहा भी गया है

अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः ।
उत्तमाः मानमिच्छन्ति मानो हि महताम् धनम्॥

 भावार्थ :
निम्न कोटि के लोग केवल धन की इच्छा रखते हैं, उन्हें सम्मान से कोई मतलब नहीं होता है । जबकि एक मध्यम कोटि का व्यक्ति धन और मान दोनों की इच्छा रखता है । और उत्तम कोटि के लोगों के लिए सम्मान हीं सर्वोपरी होता है सम्मान धन से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है ।

 👉  यदि सभ्य बनना, सभ्य होना और सभ्य कहलाना है तो निर्बध बनना-होना होगा ।’ सीरवी समाज के कुछ लोगों ने समाज की परंपराओं को इस कदर अपने कब्जे में कर रखा है कि नैतिकता- अनैतिकता, पाप-पुण्य, परिवार-पडोसी और समाज-सम्बन्धो का समीकरण एकदम उलटता जा रहा है ।

😇👉पहले हम सीरवी समाज के लोग कोई गलत काम करने से डरते- घबराते थे । कोई गलत काम कराता या गलत काम करने के लिए कहता था तो हम अपने बाल-बच्चों का वास्ता देते थे । कहते थे ”हमारे बाल-बच्चे हैं, यह गलत काम करके हम उनका भविष्य नही बिगाड़ेंगे ?”

😜👉हम आज भी कहते यही हैं लेकिन संदर्भ बदला हुआ है । कोई भी काम अब गलत नहीं रह गया है । यदि गलत काम करने से कोई हमें रोकता-टोकता है तो हम कहते हैं कि ‘भाई हमारे भी बाल-बच्चे हैं । हमें भी उनका पालन-पोषण करना है, अगर यह काम नहीं करेंगे तो उन्हें खिलाएं-पिलाएंगे कहाँ से ?’

पहले बाल-बच्चों के नाम पर या उनके कारण जो गलत काम और पाप करने से घबराते, डरते थे, आज उन्हीं बाल-बच्चों के नाम पर वही गलत काम धडल्ले से करते हमें कोई लाज-संकोच या घबराहट नहीं होती । 

😳👉कुछ लोग अपने सीरवी समाज में Superiority complex के भी शिकार हैं। ज़रा सी सफलता मिली नहीं की खुद को भगवान समझ बैठे। समाज और परिवार के लोग उन्हें अछूत लगने लगते हैं। ऐसे लोग सफलता पचा नहीं पाते हैं और सारा जीवन समाज से दूर रहते हैं। जब बुढ़ापा आता है या रिटायर हो जाते हैं और इनके अपने बच्चे भी जब इन्हें नहीं पूछते हैं तब इन्हें समाज की याद आती है। पर जो सारा जीवन सबों को दुत्कारता आया हो, उसे समाज कैसे स्वीकारे। परिणाम यह होता है की एकाकी जीवन जीने को मजबूर रहते हैं। अभी भी समय है अपने लोगों से जुड़िये, अगर आप सक्षम हैं तो लोगों की मदद कीजिये, उनकी दुआएँ आपको लगेंगी।

"सफल रिश्तों के, यही उसूल हैं,
बातें भूलिए, जो फिजूल हैं!"

👉हमारे सीरवी समाज  में महिलाओं
👭 के साथ जिस तरह का व्यवहार (बार-बार तलाक, अदला बदली कांसेप्ट) होता है, मुझे उस पर आपत्ति है और मैं इस बारे में ठोस राय रखता हूँ।  लेकिन मैं अपनी  राय प्रकट कर देता हूँ, तो उल्टा मुझे समझाते हैं,  ' चुप रहो, । इस बारे में राय देने वाले तुम कौन होते हो।"
दरअसल उनके साथ भेदभाव करने का रवैया, समाज में कूट-कूटकर भरा है।

अभी तो अपने समाज में अधिकतर महिलाओं 👧 को यह आभास भी नहीं है की वे शोषण का शिकार हो रही हैं और स्वयं एक अन्य महिला का शोषण करने में समाज को सहयोग कर रही है.

आज यह पूरे सीरवी समाज का दायित्व है कि वह नारी को बराबरी का स्थान दें। अब इसको कोई नारी मुक्ति का नाम दे या नारी शक्तिकरण का, उससे कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। नारी और पुरुष एक दूसरे के शत्रु नहीं हैं बल्कि पूरक हैं। कहा भी गया है शिव शक्ति के बिना शव के समान हैं। राधा के बिना कृष्ण आधा हैं। नारियों की समस्या केवल उनकी समस्या नहीं है। यह पूरे समाज की समस्या है। या यूं कहिए सामाजिक समस्या का एक अंग है। साफ है कि नारी की स्थिति में बदलाव लाने के लिए पूरे सामाजिक ढांचे एवं सोच में बदलाव लाना जरूरी है।

       महिलाएं समाज से अपने लिए देवी का संबोधन नहीं मांगती हैं। स्त्रियों को देवी समझा जाए या नहीं लेकिन कम से कम उन्हें मानव की श्रेणी से नीचे न गिराया जाए।

👉आप अध्ययन करके देखें तो पाएंगे कि अपनी सीरवी समाज में अपनी क्षमता से अधिक पैसे शादी पर खर्च करने की प्रवृत्ति है। इसके कई कारण होते हैं। अपने दैनंदिन जीवन में सीमित संसाधनों से अपना काम चलाने वाले व्यक्ति के लिए शादी सिर्फ एक सामाजिक समारोह न होकर यह दिखाने का अवसर होता है कि उसने पिछले 25 सालों में क्या किया? आर्थिक सीढ़ियों पर कितनी पायदानें इस बीच वह चढ़ चुका है यह दिखाने के लिए शादी के अलावा यदि उसके पास कोई दूसरा मौका होता है तो वह होता है आलीशान घर बनवाने का। 

सीरवी समाज में शादियों में होने वाले खर्च के बारे में मेरा विचार है कि शादियों का खर्च हैसियत के अंदर रहे। शादियों के खर्च को प्रतियोगिता से अलग रखना चाहिए। आप समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में पढ़ते होंगे कि हर उस समाज में जहां आज भी परंपराएं मजबूत हैं शादियों के खर्च को सीमाओं में बांधने की जद्‌दोजहद जारी है। हाल ही में मैंने पढ़ा कि किसी उत्तरी भारत के राज्य में गुर्जरों की पंचायत ने शादियों के समारोह पर कुछ प्रतिबंध लगाए हैं। समस्या यह है कि अपने समाज में पंचायतें मजबूत नहीं हैं। शहरी समाज में तो वे हैं ही नहीं। ऐसे में सामाजिक संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उदाहरण के लिए राजस्थान से निकल कर भारत के विभिन्न हिस्सों में बसे सीरवी समाज के लोगों के कई मजबूत सामाजिक संगठन हैं। ये संगठन पंचायत नहीं हैं, लेकिन चाहें तो पंचायतों जैसा महत्व हासिल कर सकते हैं। ऐसे संगठन अपने समाज में शादी विवाह पर होने वाले खर्च की सीमाएं बांध सकते हैं। हालांकि यह कहना जितना आसान है करना उतना ही मुश्किल है।

निखरती है मुसीबतों से ही!
शख्सियत यारों !!
जो चट्टान से ही ना उलझे!
वो झरना किस काम का!!

👉यह लेख लिखने की प्रक्रिया के दौरान ही कुछ मित्रों से इस विषय पर बहस हुई। एक मित्र का कहना था कि आप उपभोक्तावाद का विरोध कर रहे हैं, और यह विरोध आज के युग में ज्यादा आगे तक चलने वाला नहीं है। आज लोग महंगी कार लेकर अपनी हैसियत में आए परिवर्तन के बारे में लोगों को सूचना देना चाहते हैं। उन्हें आप किस तरह रोकेंगे। इस पर मेरा कहना यह है कि जब हम शादियों में आडंबर और धन के भद्दे प्रदर्शन पर रोक लगाने की वकालत करते हैं तो हमारा उद्देश्य वहीं तक सीमित होता है। इसे बाकी उपभोक्तावाद के साथ गड्डमड्ड नहीं करना चाहते। क्योंकि शादी एक सामाजिक समारोह है, जो हर परिवार को एक न एक दिन आयोजित करना है। जब कोई धनाढ्‌य व्यक्ति शादी में होने वाले खर्च की सीमा को ऊंचा उठा देता है तो उसके वर्ग के समकक्ष व्यक्तियों पर एक तरह का दबाव पैदा हो जाता है कि उन्हें भी अपनी सामाजिक स्थिति को बचाए रखने के लिए इसी तरह का खर्च करना होगा। इस तरह शादियों में खर्च अपव्यय और भौंडे दिखावे की सीमाएं छूने लग जाता है। लेकिन जहां तक महंगी कार, या महलनुमा घर की बात है- इस तरह का उपभोक्तावाद भले ईर्ष्या और आतंक पैदा करे लेकिन इससे समाज का आम व्यक्ति यह दबाव महसूस नहीं करता कि उसे भी इस तरह का खर्च करना होगा। एक सामाजिक एक्टिविस्ट ने ठीक ही कहा िक "जनम-वरण और मरण' के अवसर पर होने वाले अनुष्ठान सामाजिक निगरानी के तहत होने चाहिए। ये अवसर व्यक्तिगत होते हुए भी नितांत व्यक्तिगत नहीं हैं। इन तीनों अवसरों के लिए बनाए गए विधान सामाजिक पंचायतें और संगठन लागू भी कर सकते हैं, क्योंकि कोई कितना ही धनी क्यों न हो वह इस बात को स्वीकार करता है कि इन अवसरों के बारे में समाज को बोलने का अधिकार है।   

*यूँ ही  नहीं  होती हैं  जिंदगी में  तब्दीलियाँ   ....,*
*मौम को भी रोशन होने के लिये पिघलना पड़ता है*

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पत्नि 👧 का सम्मान केवल वही विवाहिता स्त्री पा सकती हा जो अपने घर को सम्भाल सके, अपने बच्चों में आत्म सम्मान तथा अपनी संस्कृति की सही पहचान करवा सके। इन बातों का उस की पढाई और कमाई से कोई सम्बन्ध नहीं।

कमाने वाली विवाहित महिला 👧 आर्थिक तौर पर स्वतन्त्र तो हो सकती है लेकिन यह जरूरी नहीं कि उसे पत्नी का दर्जा भी दिया जाये। वह केवल कमाई में ऐक पार्टनर होती है और फायदे नुकसान के अनुसार पार्टनर बदले भी जा सकते हैं। पत्नि का दर्जा पाना बहुत महत्वशाली है लेकिन नौकरी कर के कमाना कोई बहुत बडी बात नहीं होती। 

भावुक हो कर पढने की जरूरत नहीं लेकिन वैवाहिक जीवन की सच्चाई यही है। अफसोस की बात है कि आज अधिकांश भारतीय महिलायें इस बात को भूल कर विदेशी नकल कर के अपनी संस्कृति और घरों को को बरबादकर रही हैं।

👉​पैसा ही सब कुछ नहीं है​ जो लोग किसी की बाहरी हालत से उसकी कीमत लगाते हैं वह तुरंत अपना इलाज करवाएं।
मानव मूल की असली कीमत उसकी ​नैतिकता, व्यवहार, मेलजोल का तरीका, सुल्ह-रहमी, सहानुभूति और भाईचारा है​। ना कि उसकी मोजुदा शक्ल और सूरत​ … !!!
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सूर्यास्त के समय एक बार सूर्य ने सबसे पूछा, मेरी अनुपस्थिति मे मेरी जगह कौन कार्य करेगा?
समस्त विश्व मे सन्नाटा छा गया। किसी के पास कोई उत्तर नहीं था। तभी  कोने से एक आवाज आई।
दीपक ने कहा “मै हूं  ना”
मै अपना पूरा  प्रयास  करुंगा ।
आपकी सोच  में ताकत और चमक होनी चाहिए। छोटा -बड़ा होने से फर्क  नहीं पड़ता,सोच  बड़ी  होनी चाहिए। मन के भीतर  एक दीप जलाएं और सदा मुस्कुराते रहें।
🙏🌅🙏

नज़र अंदाज़ करने की आदत है मेरी लेकिन
कुछ चर्चाओं मे जागरूकता लाना फितरत है मेरी....
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Wednesday, 28 March 2018

COMMING SOON

अगर आप अंग्रेजी साहित्य की समझ रखते हैं तो आप जानते होंगे कि रोमांटिक होने का मतलब रोमांटिक होना ही है..ज्यादातर लोग रोमांस,प्यार और सेक्स सबको एक ही चीज़ समझ लेते हैं! जबकि तीनों अलग-अलग बातें हैं! मेरी कई बार इस विषय पर बहस हो चुकी है..देवानंद साहब की एक किताब है "रोमांसिंग विद लाइफ" तो ये रोमांस जीवन और प्रकृति से लेकर व्यक्ति विशेष/सोलमेट से भी संभव है..प्यार की बात करें तो ये कैरियर, लड़की, दोस्त सबसे रहता/होता है.. आप क्या कहते हैं? अगर आप चाहेंगे तो मैं इस पर विस्तार से लिखूंगा..ये मेरे पसंदीदा विषयों में से एक है..

Monday, 19 March 2018

HOPE FOR TODAY

10 best quotes on Hope for today:)

1. Do not spoil what you have by desiring what you have not; remember that what you now have was once among the things you only hoped for. #. Epicurus

2. Let your hopes, not your hurts, shape your future. #. Robert H. Schuller

3. Learn from yesterday, live for today, hope for tomorrow. The important thing is not to stop questioning. #. Albert Einstein

4. Hope is being able to see that there is light despite all of the darkness. #. Desmond Tutu

5. Success is a journey not a destination. The doing is usually more important than the outcome. Not everyone can be Number 1. #. Arthur Ashe

6. Hope is the only bee that makes honey without flowers. #. Robert Green Ingersoll

7. Hope is important because it can make the present moment less difficult to bear. If we believe that tomorrow will be better, we can bear a hardship today. #. Thich Nhat Hanh

8. Hope is important because it can make the present moment less difficult to bear. If we believe that tomorrow will be better, we can bear a hardship today. #. Thich Nhat Hanh

9. Hope is the physician of each misery. #. Irish Proverb

10. Hope is the poor man’s bread. #. Gary Herbert

Add your favourite quote on hope by commenting....

Saturday, 17 March 2018

नज़र अंदाज़ करने की आदत है मेरी लेकिन कुछ चर्चाओं मे जागरूकता लाना फितरत है मेरी.... ...

नज़र अंदाज़ करने की आदत है मेरी लेकिन कुछ चर्चाओं मे जागरूकता लाना फितरत है मेरी....
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अमेरिका मे आपको रोज नए नए UBER ड्राइवर मिलेंगे और अच्छे से अच्छे परिवारों से होंगे, यदि UBER में अगर आप पांच छह घंटे टेक्सी चला लें तो कम से कम 150 - 200  डॉलर आराम से कमा सकते हैं , सबसे मजे की बात ये है की यहाँ के लोगों को बात करने का बहुत शौक है , वे अपने बारे में भी बहुत कुछ बताते हैं और आपके बारे में भी खूब सारा पूछते हैं , इनमे से कई सारे अच्छी  नौकरियां करते हुए पार्ट टाइम उबर में ड्राइवर हैं , कोई अपना परिवार पाल रहा है , कोई अपने ग्रेजुएशन से ब्रेक लेकर अगले सेमेस्टर की फीस इकट्ठी कर रहा है , एक बार एक  व्यक्ति था जो अपनी, बेटी को डिज़्नीलैंड जाने की ख्वाहिश है उसके लिए सिर्फ फ्राइडे नाइट को टेक्सी चलाता था , एक बार एक 45 - 50 साल की महिला ड्राइवर थी , पूरा परिवार टेक्सी से पालती थी,  उसकी बेटी का फोन आया , कहा की नानी का बीपी हाई हो गया है , कार से ही उसने कौन सी गोली देनी है बेटी को बताया , इमरजेंसी हो तो क्या करना है , उसे खाना खाने को कहा !! अमेरिका के वर्क कल्चर की अपनी कमियां हैं पर एक बात सराहनीय है की यहाँ लोग किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझते , उनकी सोच के ऊपर "लोग क्या सोचेंगे" वाले ढकोसले भी ज्यादा हावी नहीं हैं !!

एक फोटो सोशल मीडिया पर चल रहा है , कुछ एमबीए वाले चपडगंजू ग्रेजुएशन गाउन पहनकर पकौड़े बनाते हुए सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं , जैसे पकौड़े बनाकर बेचना पाप हो , जैसे पकौड़े बेचने वाले इंसान नहीं होते , MBA हो भाई , master in business administration , व्यापार करने का ही तो शिक्षा पाकर निकले हो, नौकरी भाड़ में जाने दो , मुद्रा बैंक से लोन लो , कोई गारंटी नहीं , लगाओ रेलवे स्टेशन के सामने पकौड़े की दुकान , जिनकी है उनकी कमाई सुनोगे तो नौकरी की सोचोगे भी नहीं कभी !! पर पहले अपनी "नौकर" बन जाने की मानसिक गुलामी से बाहर निकालो , फिर "लोग क्या कहेंगे" वाले ढकोसलों से बाहर आओ !! दुनिया बहुत हसीन है !!

बाकि तुमने MBA और BBA करते हुए कितने झंडे गाढ़े हैं वो इंटरव्यू लेते वक्त पता चलता  रहता है.।।

जीवन को सरल बनाएं।

मैनेजमेंट की शिक्षा प्राप्त कर रहे कुछ स्टूडेंट्स को प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल्स डेवलप करने के बारे में बताया जा रहा था। कुछ देर पढ़ाने के बाद प्रोफेसर ने बच्चों को एक केस स्टडी सोल्व करने को दी।
खाली डिब्बा जापान की एक साबुन बनाने वाली कम्पनी अपनी क्वालिटी और वर्ल्ड क्लास प्रोसेसेज के लिए जानी जाती थी। पर आज उनके सामने एक अजीब समस्या आ खड़ी हुई , उन्हें कम्प्लेंट मिली की एक कस्टमर ने जब साबुन का डिब्बा खरीदा तो वो खाली था। कंप्लेंट की जांच की गयी तो पता चला चूक कंपनी के तरफ से ही हुई थी , असेंबली लाइन से जब साबुन डिलीवरी डिपार्टमेंट को भेजे जा रहे थे तब एक डिब्बा खाली ही चला गया।
इस घटना से कम्पनी की काफी किरकिरी हुई। कम्पनी के अधिकारी बड़े परेशान हुए कि आखिर ऐसा कैसे हो गया। तुरंत एक हाई लेवल मीटिंग बुलाई गयी , गहन चर्चा हुई , और भविष्य में ऐसी घटना ना हो इसके लिए लोगों से उपाए मांगे गए। बहुत विचार-विमर्श के बाद निश्चय किया गया कि असेंबली लाइन के अंत में एक एक्स-रे मशीन लगायी जायेगी जो एक हाई रेसोलुशन मॉनिटर से कनेक्टेड होगी। मॉनिटर के सामने बैठा व्यक्ति देख पायेगा की डिब्बा खाली है या भरा।
कुछ ही दिनों में ये सिस्टम इम्प्लीमेंट कर दिया गया, पर जब एक छोटी रैंक के कर्मचारी को इस समस्या का पता चला तो उसने इस समस्या का हल एक बड़े ही सस्ते और आसान तरीके से निकाल दिया। एक ऐसा तरीका जिसमे ना लाखों की मशीन खरीदने का खर्च था और ना ही किसी आदमी को रखने की ज़रुरत।
सोचिये अगर आपके सामने ये समस्या आती तो आप क्या करते ?
उस आदमी ने ये किया – उसने एक हाई पावर इलेक्ट्रिकल फैन खरीदा और असेंबली लाइन के सामने लगा दिया , अब हर एक डिब्बे को पंखे की तेज हवा के सामने से होकर गुजरना पड़ता और जैसे ही कोई खाली डिब्बा सामने आता हवा उसे उड़ा कर दूर फेंक देती।
फ्रेंड्स, इस तरह के सोल्युशन को हम आउट ऑफ़ द बॉक्स या क्रिएटिव थिंकिंग कहते हैं। और सबसे अच्छी बात ये है कि इसका किताबी ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं होता।  हममें से हर एक व्यक्ति अपनी समस्याओं को सरल तरीकों से सुलझा सकता है पर शायद हम सबसे पहले दिमाग में आने वाले हल को ही पकड़ कर बैठ जाते हैं।  आइये इस केस स्टडी से प्रेरणा लेते हुए हम भी अपनी समस्याओं के नए-नए समाधान ढूंढें और इस जीवन को सरल बनाएं।।