Saturday, 28 April 2018


।।  राम राम सा ।।
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सभी फेसबुक प्रेमियो  को राम राम सा और अभी मारवाड़ मे शादी-विवाह का सीजन चल रहा है अब शादियों में पुराने रीति रिवाज तो एकदम लुप्त होने के कगार पर है पहले बारात तीन दिन तक रुकती थी  और अब सिर्फ एक ही दिन मे काम पुरा हो जाता  है वह तो समय की आवश्यकता है तो सही ही है परन्तु जो खास बदलाव हुआ है वह भोजन और पहनावा  वह समाज और संस्कृति को नस्ट कर रहा है
पहले बारातियो के खाने  मे लापसी, देसी घी का चूरमा , सिरा, दाल ,कड़ी, चंणा, रोटी ही मुख्य भोजन एवम नास्ते मे खिसड़ी बनायी जाती थी जो परिवार वाले मिलकर बना देते थे अभी महंगे हलवाई लाकर लोग शादी मे आधुनिक प्रचलन के तहत विभिन्न प्रकार की  मिठाईया बेसन और तेल से तली हुई चीजे  बनाते है जो शरीर के लिये  बहुत ही हानिकारक है एक दुसरे की होड लगाकर शादी के खर्चे को बडावा दे रहे हैं  पहनावे मे वर और वधु अपने अपने पारम्परिक पहनावे  को छोड़कर नये फैसन के कपड़े सिलवाते है उनसे फिजूल खर्ची भी कह सकते हैं और उनसे  भी ज्यादा अपनी संस्कृति का भी नाश होता है   और ये बदलाव पांच छह साल से कुछ ज्यादा ही हो रहा है अब तो बारात खड़े खड़े जाओ, खड़े खड़े खाओ और खड़े खड़े ही वापस आओ  अपनी परम्परागत संस्कृति को भूलना भी समाज के लिए बहुत ही हानिकारक है

आजकल शादी विवाह समारोह एक सामाजिक तथा परिवारिक प्रोग्राम नहीं रह कर लोगों का शक्ति प्रदर्शन का जरिया रह गई है आज शादी विवाह में आदमी अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है चाहे वह किसी से कंपटीशन के चक्कर में सोना ज्यादा खरीद रहा हो या ज्यादा मेहमान बुलाने की कंपटीशन हो या फिर दिखावा सब में शक्ति प्रदर्शन हो रहा है और इसमें परिवारिक लोगों को कम महत्व देकर नेता और पैसे वालों को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है
पड़ोसी और गरीब की शादी में कोई जाना नहीं चाहता

खर्चीले विवाह हमें दरिद्र बनाते हैं।

भारत में व्यक्ति अपने जीवन भर की कमाई का 20 % शादी-विवाहों में खर्च करता है।

भारत में 3 लाख रुपये हैे प्रति विवाह औसत खर्च

जरा हटकर लेख -

खर्चीले विवाहों का औचित्य ?

        वर्तमान में मुझे विवाह की परिभाषा बदलती हुई नजर आ रही है। अब विवाह का अर्थ वि + वाह ! पर आधारित हो गया है अर्थात विवाह वही जिसे देखकर लोग कहें - वाह वाह ! वाह वाह !
        यह स्थिति कमोवेश हर वर्ग में देखने को मिल जाती है । आपके पास पर्याप्त अर्थ ( धन ) की व्यवस्था हो या न हो , वाहवाही जरूरी है। इसके लिए हम अपनी सामर्थ्य के बाहर जाकर भी आयोजन करने से पीछे नही हटते हैं।
       बस यहीं से शुरू होता है -खर्चीली शादियों का चलन , जो हमारे झूटे दर्प को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है । यह कुछ समय के लिए हमारी " नाक " को बड़ी जरूर कर देता है लेकिन बाद में देखा देखी करने वालों की " नाक " कटवाने से भी पीछे नही रहता है और कभी कभी तो हमारी भी।
      खर्च करना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है इसलिए औचित्य - अनोचित्य की बात करना बेमानी है । हम सब यही कहेंगे - खर्चीली शादी का कोई औचित्य नहीं पर जब अपना वक्त आएगा तो वही करेंगे जो अन्य लोग करते आए हैं । बराबरी तो कोई भी, कभी भी किसी भी क्षेत्र में नही कर सकता लेकिन बढ़ - चढ़ कर , करने का प्रयास जरूर करता है। क्योंकि आज का  दौर दिखावे का और मनमर्जी का है। इस दौर में जागरूक और मितव्ययी व्यक्ति भी अपने परिजनों और अपनी प्रतिष्ठा के दवाब में , वह सब करता है जिसे हम अनुचित और अनावश्यक ठहराते हैं ।
      जो हो रहा है वह आगे भी होता रहेगा । मैं यहां विवाह में होने वाली फिजूलखर्ची के बारे में कुछ नही लिखना चाहता क्योंकि मैं जानता हूँ उपदेश देने सरल है पर उन पर अमल करना नामुमकिन।
        हां , एक बात जरूर कहना चाहता हूँ ,जिसे हम सब अपना सकते हैं और इसके लिए समारोह में शामिल होने गये अपने परिजनों / मित्रों को भी प्रेरित कर सकते हैं । वह यह - प्लेट में खाना उतना ही लें जितना जरूरी हो। समारोहों में अनेक स्टॉल होते हैं उनमें से भी वही लें जो आपके स्वास्थ्य के लिए हितकर हों । पेटू न बनें ।
       मैने अक्सर उन लोगों को देखा है - जो अपनी प्लेट में सब चीजें बहुतायत में उंडेल लेते हैं और फिर उन्हें ना खाने की स्थिति में डस्टबिन में डाल देते हैं । हमारी इस खराब आदत को यदि हम बदल सकें तो यही हमारे लिए खर्च बचाने में बड़ा योगदान होगा। कम से कम हम खुद तो आत्म सन्तोष लेकर लौटेंगे ही।

नरेंद्र सोलंकी
                

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