Saturday, 28 April 2018

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शादी विवाह समारोह
आजकल शादी विवाह समारोह एक सामाजिक तथा परिवारिक प्रोग्राम नहीं रह कर लोगों का शक्ति प्रदर्शन का जरिया रह गई है आज शादी विवाह में आदमी अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है चाहे वह किसी से कंपटीशन के चक्कर में सोना ज्यादा खरीद रहा हो या ज्यादा मेहमान बुलाने की कंपटीशन हो या फिर दिखावा सब में शक्ति प्रदर्शन हो रहा है और इसमें परिवारिक लोगों को कम महत्व देकर नेता और पैसे वालों को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है
पड़ोसी और गरीब की शादी में कोई जाना नहीं चाहता

फिजूल खर्चे और बदहाली में इंसान

सत्यम सिंह बघेल(आलेख)

सामाजिक आयोजनों में होने वाला फिजूल खर्च समाज को अन्दर ही अन्दर खोखला कर रहा है, यह पूरे समाज में कैंसर जैसी घातक बीमारी की भांति फैला हुआ है जो दिन व दिन बढ़ते ही जा रहा है, रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है । हमारे देश की अर्थव्यवस्था का आधार हमेशा से व्यक्ति की आय में बचत करना रहा है, जो व्यक्ति की भविष्य की सुरक्षा के साथ-साथ राष्ट्र की संपदा के प्रति सम्मान माना जाता है। एक जमाने में लाख रुपया अनेक लोगों के जीवन का लक्ष्य होता था और आज करोड़ों की बातें इस तरह की जाती है मानो वह मात्र सौ रुपया है। आज सामान्य जीवन में कंजूसी को अपशब्द की तरह बना दिया गया है। सबसे घातक बात तो यह है कि किफायत एवं कम दाम में अर्थात सोच समझकर वाजिब मूल्य में आवश्यक वस्तु खरीदना है परंतु इसे पुराना विचार कहकर आधुनिकता के खिलाफ खड़ा किया जाने लगा है । हमने अपने बच्चों को प्यार के नाम पर उन्हें बेहिसाब रुपए जेब खर्च के लिए देना शुरू कर दिए हैं और उनसे हिसाब मांगने को तो गुनाह का दर्जा दे दिया गया है। पहले परम्परा थी, जब जेब खर्च का हिसाब मांगा जाता था जो एक स्वस्थ बात होने के साथ धन का मूल्य समझाने की कोशिश थी। एक तरह से पैसा बचाना, पैसा कमाने की तरह है जैसे क्रिकेट में चुस्त फील्डर रन बचाता है जो उसके रन बनाने के खाते में जोड़कर उस खिलाड़ी का मूल्यांकन होता है। एक बार के क्रिकेट में एकनाथ सोलकर शॉर्ट मिड ऑन पर खड़े रहकर जमीन पर गिरने के एक इंच पूर्व ही कैच कर लिए थे, जाने प्रसन्ना, चंद्रशेखर और वेंकटरमण को मिले विकेट में एकनाथ सोलकर का सहयोग कितना महत्वपूर्ण था। इसी तरह जीवन में रुपया बचाने का महत्व है। फिजूल खर्ची को तड़क-भड़क और दिखावे की जीवन शैली का हिस्सा बना दिया गया है। रेस्त्रां में आवश्यकता से अधिक भोजन के ऑर्डर देने को फैशन का हिस्सा बनाकर राष्ट्रीय संपत्ति का अपव्यय बना दिया गया है। वहीँ समाज का उच्च एवं संपन्न वर्ग अपने समस्त आयोजनों को बढ़ा-चढ़ाकर सम्पन्न करता है । निश्चित ही इससे समाज का मध्यम वर्ग तथा निम्न वर्ग प्रभावित हुए बिना नहीं रहता । वह भी कर्ज की सूली पर चढ़कर उसका अनुसरण करने लगता है और अपना सर्वस्व मिटा देता है । हम देखते हैं कि नवजात शिशु के स्वागत में लोग इतना बड़ा समारोह आयोजित कर देते हैं कि वह बच्चा जन्मजात क़र्जदार बन जाता है। शादीओं में लोग इतना खर्च कर देते हैं कि आगे जाकर उनका गृहस्थ जीवन चौपट हो जाता है। मृत्यु-भोज का कर्ज़ चुकाने में ज़िंदा लोगों को तिल-तिलकर मरना होता है। यह बीमारी आजकल पहले से कई गुना बढ़ गई है और बढ़ते ही जा रही है, यह घातक बीमारी समय के साथ-साथ अपनी जड़े मजबूत करते जा रही है । सामाजिक आयोजनों में बढ़ते फिजूल खर्चे को देखकर तो ऐसा लगता है मानों लोगों में खर्चे करने की कोई प्रतियोगिता चल रही है, देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई प्रतिस्पर्धा है । लोग देखा-दिखी में अपनी औकात से ज्यादा ही खर्च कर देते हैं कभी-कभी तो लोग अपनी जमीन, व्यापार, संपत्ति बैचकर, गिरबी रखकर अपने आयोजन में खर्च कर देते हैं । कभी कभी तो लोग कर्जा लेकर आयोजनों में खर्च कर देते हैं और इतना अधिक खर्च कर देते हैं कि एक-दो पीढ़ी तक उस कर्ज से मुक्ति पाना संभव ही नही होता है । विवाह, मृत्यु भोज, दहेज, कपड़ा प्रथा, विवाह में शराब, आर्केस्ट्रा, साज-सज्जा इत्यादि में लोग लाखों-करोड़ों खर्चा करते हैं इससे क्या मिलता है, क्या यह सब खुशियाँ मनाने के लिए किया जाता है, अगर यह सब खुशियाँ मानाने के लिए किया जाता है तो फिर ऐसी खुशियाँ किस काम की जिसमे एक दिन तो ख़ुशी मना ली फिर उसी ख़ुशी के लिए सारा जीवन रोते रहे । यह सब खुशियाँ मनाने के लिए नही वरन दिखावे के लिए किया जाता है । लोग सामाजिक आयोजनों में किये जाने वाले फिजूल खर्चे को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देखने लगे हैं । जो जितना अधिक खर्चा करता है समाज में वह व्यक्ति उतना ही अधिक चर्चित और सम्मानित व्यक्ति बन जाता है, इसलिए व्यक्ति अपने किसी भी आयोजन में बढ़-चढ़कर खर्चता है । आजकल निमंत्रण-पत्रों के साथ प्रेषित तोहफ़ों पर ही लाखों रू. खर्च कर दिए जाते हैं। यह शेख़ी का जमाना है। हर आदमी अपनी तुलना अपने से ज्यादा मालदार लोगों से करने लगता है। दूसरों की देखा-देखी लोग अंधाधुंध खर्च करते हैं। इस खर्च को पूरा करने के लिए सीधे-सादे लोग या तो कर्ज़ कर लेते हैं या अपनी ज़मीन-जायदाद बेच देते हैं और तिकड़मी लोग घनघोर भ्रष्टाचार में डूब जाते हैं। येन-केन-प्रकरेण पैसा कमाने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। अगर ये सब दाव-पेच भी फेल हो जाएं तो वे लड़की वालों पर सवारी गाँठते हैं। अपनी हसरतों का बोझ वे दहेज़ के रूप में वधू-पक्ष पर थोप देते हैं। वहीँ समाज की सोच भी ऐसी ही है, आज चहुंओर फिजूल खर्ची को बढ़ावा दिया जा रहा है और इसे आधुनिकता कहने की गलती भी की जा रही है। टीवी में मैंने एक सीरियल देखा 'आइना दुल्हन का' इस सीरियल में एक मध्यम वर्ग परिवार की एक कन्या को दादी ने अतिरिक्त लाड़-प्यार से पालकर फैशन परस्त एवं फिजूल खर्ची को शान समझने वाली लड़की बना दिया है। वह अपने विवाह पर अपने मध्यम वर्गीय माता-पिता पर दबाव बनाकर इतना खर्च कराती है कि उन्हें अपनी जमीन बेचनी पड़ती है। उसके द्वारा दहेज में जबरन ली गई कार की यह प्रतिक्रिया है कि उसकी ननद का विवाह दहेज में कार नहीं लाने के कारण टूट जाता है। उसकी छोटी बहन जिसे माता-पिता ने किफायत के मूल्यों में ढाला है, वह अपने विवाह सादगी से करती है तो उसका निठल्ला पति उसे ताने देता रहता है गोयाकि दहेज की एक कार किस तरह तीन घरों को तोड़ देती है तथा एक दादी का अतिरिक्त लाड़-प्यार एवं बेटी के अव्यवहारिक मूल्य तीन परिवारों को दिवालियेपन की कगार पर पहुंचा देता हैं। फिजूल खर्ची झूठी शान शौकत की एक घटना परिवार के तमाम रिश्तों में दरारें डाल देती हैं और ऐसी ही घटना हमारे वास्तविक जीवन में एवं समाज के अन्दर देखने को मिलती हैं, जो कि यह प्रथा बहुत गलत है । हमें ऐसे अनुसरण करने वालों को रोकना होगा तथा सर्वस्व विनाश से उनको बचाना होगा । वैसे आजकल देखने-सुनने को मिल रहा है कि कुछ सामाजिक संगठन इन सामाजिक आयोजनों में होने वाले फिजूल खर्चों में प्रतिबन्ध लगाने के लिए खुद के नियम-कानून बना रहे हैं और शादी या अन्य आयोजनों के लिए लोगों की आमदनी और खर्चे का अनुपात तय कर रहे हैं, लेकिन यह सुझाव बिल्कुल बेकार सिद्ध होगा, जैसा कि चुनाव-खर्च का होता है। लेकिन हाँ आयोजनों में अतिथियों की संख्या जरूर सीमित की जा सकती है और परोसे जानेवाले व्यंजनों की भी संख्यां में कमी जरुर की जा सकती है, इस प्रावधान का कुछ असर जरूर होगा लेकिन सबसे ज्यादा असर इस कदम का होगा कि कानून द्वारा इन आयोजनों में किये जाने वाले खर्चे की समय-सीमा तय कर दी जाये और जहां भी क़ानून के विरूद्ध लाखों-करोड़ों का खर्च दिखे, सरकार वहीं शादी या अन्य आयोजन के मौके पर छापा मार दे। आयोजन में शामिल लोगों को गिरफ्तार करके उनसे आयोजन का हिसाब माँगें कि वे यह पैसा कहां से लाए। देश में अगर ऐसे चालीस-पचास स्थान पर ही छापे पड़ जाएं तो शेष फ़िजूलख़र्च लोगों के पसीने छूट जाएँगे। साथ ही समाज को इसके लिए जागरूक करने की आवश्यकता है कि यह सिर्फ मितव्ययता है, हमारे आर्थिक एवं सामाजिक विनाश का कारण है और कुछ नही । हमे फिजूल खर्चे को रोकने के लिए ऐसा मार्ग प्रशस्त करने की आवश्यकता है कि शान भी बनी रहे और विनाश से बचा जा सके । लोगों को नयी प्रेरणा देनी होगी कि फिजूलखर्ची के अनुसरणों से हम अपना बचाव कैसे कर सकते हैं । समाज में समय रहते ही इस मितव्ययता पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है, इसके लिए समाज को और समाज के अन्य घटकों को जागरूक करने एवं उन्हें खुद को जागरूक होने की आवश्यकता है । आज के समय में सादा जीवन उच्चविचार की राह पर चलना अतिआवश्यक है ।

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